शनिवार, 30 जुलाई 2011

अष्टावक्र गीता (षष्ठ अध्याय)

|| अष्टावक्र गीता ||
षष्ठ अध्याय

जनक उवाच -
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत् |
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ||६- १||

(राजा जनक कहते हैं - आकाश के समान मैं अनंत हूँ और यह जगत घड़े के समान महत्त्वहीन है, यह ज्ञान है। इसका न त्याग करना है और न ग्रहण, बस इसके साथ एकरूप होना है॥१॥)

महोदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसऽन्निभः |
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ||६- २||

(मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एकरूप होना है॥२॥)

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना |
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ||६- ३||

(यह विश्व मुझमें वैसे ही कल्पित है जैसे कि सीप में चाँदी। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एकरूप होना है॥३॥ )

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि |
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ||६- ४||

(मैं समस्त प्राणियों में हूँ जैसे सभी प्राणी मुझमें हैं। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एकरूप होना है॥४॥)

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद, अष्टावक्र गीता शेयर करने ले लिए।

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद, अष्टावक्र गीता शेयर करने ले लिए।

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  3. बहुत बहुत धन्यवाद, अष्टावक्र गीता शेयर करने ले लिए।

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