रविवार, 7 अप्रैल 2013

श्री गुरु पादुका पंचकम्



।।श्री गुरु पादुका पंचकम्।।

नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो  

नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः ।।

आचार्य सिध्देश्वर पादुकाभ्यो 

नमोस्तु लक्ष्मीपति पादुकाभ्यः ।।1।।

(सभी गुरुओं को नमस्कार है, सभी गुरुओं की पादुकाओं को नमस्कार है श्री गुरुदेव जी के गुरुओं अथवा पर गुरुओं एवं उनकी पादुकाओं को नमस्कार है आचार्यों एवं सिद्ध विद्याओं के स्वामी की पादुकाओं को नमस्कार है बारंबार श्री गुरु-पादुकाओं को नमस्कार है)


कामादि सर्प व्रजगारुडाभ्यां

विवेक वैराग्य निधि प्रदाभ्यां ।।

बोध प्रदाभ्यां द्रुत मोक्षदाभ्यां

नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां ।।2।।


(यह अंतः करण के काम क्रोध आदि महा सर्पों के विष को उतारने वाली विष वैद्य है विवेक अर्थात अन्तरज्ञान एवं वैराग्य का भंडार देने वाली है यह प्रत्यक्ष ज्ञान प्रदायिनी एवं शीघ्र मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं श्री गुरुदेव की ऐसी पादुकाओं को नमस्कार है, नमस्कार है)


अनंत संसार समुद्रतार,

नौकायिताभ्यां स्थिर भक्तिदाभ्यां

जाड्याब्धि संशोषण वाड्वाभ्यां 
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥ ।।3।।


(यह अंतहीन संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिये जो नौका बन गई है अविचल भक्ति देने वाली आलस्य प्रमाद और अज्ञान रूपी जड़ता के समुद्र को भस्म करने के लिये जो वडवाग्नि के समान है ऐसी श्री गुरुदेव की चरण पादुकाओं को नमस्कार है, नमस्कार है)

    
 ऊँकार ह्रींकार रहस्ययुक्त

श्रींकार गुढ़ार्थ महाविभूत्या

ऊँकार मर्मं प्रतिपादिनीभ्यां

नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां ।।4।।

( जो वाग (वाणी) बीज ॐकार और माया बीज ह्रैमीं कार के रहस्य से युक्त षोढ़सी बीज श्रींकार के गूढ़ अर्थ को महान ऐश्वर्य से कार के मर्मस्थान को प्रगट करने वाली हैं ऐसी श्री गुरुदेव की चरण पादुकाओं को नमस्कार है, नमस्कार है)

होत्राग्नि, हौत्राग्नि हविष्य होतृ

होमादि सर्वकृति भासमानम्

यद ब्रह्म तद वो धवितारिणीभ्यां,

नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां ।।5।।

(होत्र और हौत्र ये दोनों प्रकार की अग्नियों में हवन सामग्री होम करने वाला होता हैं और होम आदि रूप में भासित एक ही परब्रह्म तत्त्व का साक्षात अनुभव कराने वाले श्री गुरुदेव की चरण पादुकाओं को नमस्कार है, नमस्कार है)

।। हरि ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।।

अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्यां।
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥१॥

कवित्व वाराशि निशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावांबुदमालिक्याभ्यां।
दूरीकृतानम्र विपत्तिताभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥२॥

नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्च वाचसपतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥३॥

नाली कनी काशपदाहृताभ्यां नानाविमोहादिनिवारिकाभ्यां।
नमज्जनाभीष्टततिब्रदाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥४॥

नृपालिमौलि ब्रज रत्न कांति सरिद्विराज्झषकन्यकाभ्यां।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपंक्ते: नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥५॥

पापांधकारार्क परंपराभ्यां पापत्रयाहीन्द्र खगेश्वराभ्यां।
जाड्याब्धि संशोषण वाड्वाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥६॥

शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां समाधि दान व्रत दीक्षिताभ्यां।
रमाधवांघ्रि स्थिरभक्तिदाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥७॥

स्वार्चा पराणामखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्ष धुरंधराभ्यां।
स्वान्ताच्छ भावप्रदपूजनाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥८॥

कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां विवेक वैराग्य निधि प्रदाभ्यां।
बोध प्रदाभ्यां दृत मोक्ष दाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥९॥


पुरुष सूक्त

                   सूर्य के समतुल्य तेजसम्पन्न, अहंकाररहित वह विराट पुरुष है, जिसको जानने के बाद साधक या उपासक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्षप्राप्ति का यही मार्ग है, इससे भिन्न और कोई मार्ग नहीं।                                                                                                                                     (यजुर्वेदः 31.18)
                 ऋग्वेद १०.९० सूक्त पुरुष सूक्त कहलाता है। इस सूक्त का ऋषि नारायण है और देवता पुरुष है। पुरुष वह है जो प्रकृति को प्रभावित कर सके। पुरुष सूक्त को समझने की कुंजी हमें स्कन्द पुराण ६.२३९ से प्राप्त होती है जहां पुरुष सूक्त का विनियोग विष्णु की मूर्ति की अर्चना के विभिन्न स्तरों पर किया गया है। 

                             पुरुष सूक्त

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
 स भूमिँसर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङगुलम्।।

(जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माँड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं।।1।।)
पुरुषऽएवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।।2।।

(जो सृष्टि बन चुकी, जो बनने वाली है, यह सब विराट पुरुष ही हैं। इस अमर जीव-जगत के भी वे ही स्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वे ही स्वामी हैं।।2।।)
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः।
पादोઽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।3।।

(विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है। इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं।।3।।)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
 ततो विष्वङ व्यक्रामत्साशनानशनऽअभि।।4।।

(चार भागों वाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसार, जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है। इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में समाये हुए हैं।।4।।)
ततो विराडजायत विराजोऽअधि पूरुषः।
स जातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः।।5।।
(उस विराट पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ। उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए। वही देहधारीरूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को, फिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया।।5।।)
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये।।6।।

(उस सर्वश्रेष्ठ विराट प्रकृति यज्ञ से दधियुक्त घृत प्राप्त हुआ (जिससे विराट पुरुष की पूजा होती है)। वायुदेव से संबंधित पशु हरिण, गौ, अश्वादि की उत्पत्ति उस विराट पुरुष के द्वारा ही हुई।।6।।)
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।7।।

(उस विराट यत्र पुरुष से ऋग्वेद एवं सामवेद का प्रकटीकरण हुआ। उसी से यजुर्वेद एवं अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ अर्थात् वेद की ऋचाओं का प्रकटीकरण हुआ।।7।।)
तस्मादश्वाऽअजायन्त ये के चोभयादतः।
 गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः।।8।।

(उस विराट यज्ञ पुरुष से दोनों तरफ दाँतवाले घोड़े हुए और उसी विराट पुरुष से गौएँ, बकरियाँ और भेड़ें आदि पशु भी उत्पन्न हुए।।8।।)
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
 तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये।।9।।

(मंत्रद्रष्टा ऋषियों एवं योगाभ्यासियों ने सर्वप्रथम प्रकट हुए पूजनीय विराट पुरुष को यज्ञ (सृष्टि के पूर्व विद्यमान महान ब्रह्मांडरूप यज्ञ अर्थात् सृष्टि यज्ञ) में अभिषिक्त करके उसी यज्ञरूप परम पुरुष से ही यज्ञ (आत्मयज्ञ) का प्रादुर्भाव किया।।9।।)
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
 मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादाऽउच्येते।।10।।

(संकल्प द्वारा प्रकट हुए जिस विराट पुरुष का ज्ञानी जन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं, वे उसकी कितने प्रकार से कल्पना करते हैं ? उसका मुख क्या है ? भुजा, जाँघें और पाँव कौन से हैं ? शरीर-संरचना में वह पुरुष किस प्रकार पूर्ण बना ?।।10।।)
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद् भ्याँ शूद्रोऽअजायत।।11।।

(विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण अर्थात ज्ञानीजन (विवेकवान) हुए। क्षत्रिय अर्थात् पराक्रमी व्यक्ति, उसके शरीर में विद्यमान बाहुओं के समान हैं। वैश्य अर्थात् पोषणशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति उसके जंघा एवं सेवाधर्मी व्यक्ति उसके पैर हुए।।11।।)
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादिग्निरजायत।।12।।

(विराट पुरुष की नाभी से अंतरिक्ष, सिर से द्युलोक, पाँवों से भूमि तथा कानों से दिशाएँ प्रकट हुई। इसी प्रकार (अनेकानेक) लोकों को कल्पित किया गया है (रचा गया है)।।13।।)
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
 वसन्तो
स्यासीदाज्यं ग्रीष्मइध्मः शरद्धविः।।14।।
(जब देवों ने विराट पुरुष को हवि मानकर यज्ञ का शुभारम्भ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन (समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई।।14।।)
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
 देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽअबध्नन् पुरुषं पशुम्।।15।।

(देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उसमें विराट पुरुष को ही पशु (हव्य) रूप की भावना से बाँधा (नियुक्त किया), उसमें यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र) एवं इक्कीस (छंद) समिधाएँ हुईं।।15।।)
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
 ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।16।।

(आदिश्रेष्ठ धर्मपरायण देवों ने यज्ञ से यज्ञरूप विराट सत्ता का यजन किया। यज्ञीय जीवन जीने वाले धार्मिक महात्माजन पूर्वकाल के साध्य देवताओं के निवास स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं।।16।।)
                                (* शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!*)

गोपी गीत


'गोपी गीत' श्रीमदभागवत महापुराण के दसवें स्कंध के रासपंचाध्यायी का ३१ वां अध्याय है। इसमें १९ श्लोक हैं । रास लीला के समय गोपियों को मान हो जाता है । भगवान् उनका मान भंग करने के लिए अंतर्धान हो जाते हैं । उन्हें न पाकर गोपियाँ व्याकुल हो जाती हैं । वे आर्त्त स्वर में श्रीकृष्ण को पुकारती हैं, यही विरहगान गोपी गीत है । इसमें प्रेम के अश्रु, मिलन की प्यास, दर्शन की उत्कंठा और स्मृतियों का रूदन है । भगवद प्रेम सम्बन्ध में गोपियों का प्रेम सबसे निर्मल, सर्वोच्च और अतुलनीय माना गया है।

गोप्य ऊचुः
(गोपियाँ विरहावेश में गाने लगीं)
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1
(हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।।)
शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥2
(हे हमारे प्रेम पूर्ण ह्रदय के स्वामी ! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो । हे हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर ! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से ह्त्या करना ही वध है।।)
विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥3
(हे पुरुष शिरोमणि ! यमुनाजी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु , अजगर के रूप में खाने वाली मृत्यु अघासुर , इन्द्र की वर्षा , आंधी , बिजली, दावानल , वृषभासुर और व्योमासुर आदि से एवम भिन्न भिन्न अवसरों पर सब प्रकार के भयों से तुमने बार- बार हम लोगों की रक्षा की है।)
न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥4
(हे परम सखा ! तुम केवल यशोदा के ही पुत्र नहीं हो; समस्त शरीरधारियों के ह्रदय में रहने वाले उनके साक्षी हो, अन्तर्यामी हो । ! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो।।)
विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् ।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥5
(हे यदुवंश शिरोमणि ! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने वालों में सबसे आगे हो । जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो।।)
व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥6
(हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं । हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ।।)
प्रणतदेहिनांपापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥7
(तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो।।) 
गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥8
(हे कमल नयन ! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं । उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं । हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो।।)
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥9
(हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है । विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं - भक्तकवियों ने उसका गान किया है, वह सारे पाप - ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल - परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।) 
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10
(हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है , उसके बाद तुम मिले । तुमने एकांत में ह्रदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं । हे छलिया ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं।।)
चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11
(हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है । हमें बड़ा दुःख होता है।।)
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12
(हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं की तुम्हारे मुख कमल पर नीली नीली अलकें लटक रही हैं और गौओं के खुर से उड़ उड़कर घनी धुल पड़ी हुई है । तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखा दिखाकर हमारे ह्रदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हो।।)
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13
(हे प्रियतम ! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो । तुम्हारे चरण कमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले है । स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं । और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं । आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिंतन करना उचित है जिससे सारी आपत्तियां कट जाती हैं । हे कुंजबिहारी ! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरूप चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की व्यथा शांत कर दो।।)
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14
(हे वीर शिरोमणि ! तुम्हारा अधरामृत मिलन के सुख को को बढ़ाने वाला है । वह विरहजन्य समस्त शोक संताप को नष्ट कर देता है । यह गाने वाली बांसुरी भलीभांति उसे चूमती रहती है । जिन्होंने उसे एक बार पी लिया, उन लोगों को फिर अन्य सारी आसक्तियों का स्मरण भी नहीं होता । अपना वही अधरामृत हमें पिलाओ।।)
अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥15
(हे प्यारे ! दिन के समय जब तुम वन में विहार करने के लिए चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिए एक एक क्षण युग के समान हो जाता है और जब तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकों से युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविंद हम देखती हैं, उस समय पलकों का गिरना भी हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है की इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है।।)
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥16
(हे हमारे प्यारे श्याम सुन्दर ! हम अपने पति-पुत्र, भाई -बन्धु, और कुल परिवार का त्यागकर, उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं । हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं । हे कपटी ! इस प्रकार रात्रि के समय आयी हुई युवतियों को तुम्हारे सिवा और कौन छोड़ सकता है।।)
रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् ।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥17
(हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगाने वाली बातें किया करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निरंतर निवास करती हैं । हे प्रिये ! तबसे अब तक निरंतर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है।।)
व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥18
(हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के ह्रदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।।)
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥19
(हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे चरण, कमल से भी कोमल हैं । उन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो । क्या कंकड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमे पीड़ा नहीं होती ? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम सिर्फ तुम्हारी हैं।।)

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

।। प्रार्थना ।।


।। प्रार्थना ।।
ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान ।
अर्यमा देवैः सजोषाः।।
                 ऋग्वेद - १।६।१७।१।।
(हे परमेश्वर‌ ! आप हमें सरल (शुद्ध‌) कोमलत्वादि-गुणविशिष्ट चक्रवर्ती राजाओं की नीति प्रदान करने की कृपा करें, आप सर्वोत्कृष्ट‌ होने से वरुण हैं, अतः हमें वर राज्य, वर विद्या वर नीति दें तथा सबके मित्र, शत्रुता-रहित हों। हमें भी आप मित्र गुणों से युक्त तथा न्याय प्रिय बनायें। आप सर्वोत्कृष्ट विद्वान हैं हमें भी सत्य विद्या से युक्त सुनीति प्रदान करके साम्राज्याधिकारी बनायें । आप "अर्यमा" (यमराज‌) प्रियाप्रिय को छोड़ कर न्यायवान हैं सब संसार के जीवों के पाप और पुण्यों की यथा योग्य व्यवस्था करने वाले हैं अतः हमें भी आप तदनुकूल बनायें जिससे हम आपकी कृपा से विद्वानों वा दिव्यगुणों के साथ उत्तम प्रीति-युक्त आप में रमण और आपका सेवन करने वाले हों। हे कृपा सिन्धु भगवन् ! हमारी सहायता करें जिससे हम सुनीति युक्त हों और हमारा स्वराज्य निरंतर बृद्धि को प्राप्त हो ।। )

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

चतुःश्लोकी


॥ चतुःश्लोकी ॥

सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः।
स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन॥१॥

(सभी समय, सब प्रकार से व्रज के राजा श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए। केवल यह ही धर्म है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं॥१॥)

एवं सदा स्वकर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति।
प्रभुः सर्व समर्थो हि ततो निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥२॥

(इस प्रकार अपने कर्तव्यों का हमेशा पालन करते रहना चाहिए, प्रभु सर्व समर्थ हैं इसको ध्यान रखते हुए निश्चिन्ततापूर्वक रहें॥२॥)

यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि।
ततः किमपरं ब्रूहि लोकिकैर्वैदिकैरपि॥३॥

(यदि तुमने सबके आत्मस्वरुप गोकुल के राजा श्रीकृष्ण को अपने ह्रदय में धारण किया हुआ है, फिर क्या उससे बढ़कर कोई और सांसारिक और वैदिक कार्य है॥३॥)

अतः सर्वात्मना शश्ववतगोकुलेश्वर पादयोः।
स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥४॥
॥इति श्री वल्लभाचार्य कृत चतुःश्लोकी सम्पूर्णा॥

(अतः सबके आत्मस्वरुप गोकुल के शाश्वत ईश्वर श्रीकृष्ण के चरणों का स्मरण और भजन कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए, ऐसा मेरा (श्री वल्लभाचार्य का) विचार है॥४॥)
(॥इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य कृत चतुःश्लोकी पूर्ण हुआ॥)

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

अष्टावक्र गीता (सप्तदश अध्याय)


|| अष्टावक्र गीता ||
सप्तदश अध्याय


अष्टावक्र उवाच -
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा |
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः ||१७- १||

(श्री अष्टावक्र जी कहते हैं -
जो पुरुष नित्य तृप्त है, शुद्ध इन्द्रिय वाला है और अकेला रमता है, उसे ही ज्ञान का फल और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है॥१॥)  

न कदाचिज्जगत्यस्मिन् तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति |
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ||१७- २||

(तत्व ज्ञानी इस जगत के लिए कभी भी खेद को प्राप्त नहीं होता है क्योंकि (वह जनता है कि) उसी एक से यह ब्रह्मांड मंडल पूर्ण है॥२॥)

न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी |
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः ||१७- ३||

(ये कोई भी बिषय स्वात्माराम (आत्मा में रमण करने वाले) को कभी भी हर्षित नहीं करते हैं जैसे सल्लकी (गन्नों) के पत्तों से प्रसन्न हुए हाथी को नीम के पत्ते हर्षित नहीं करते॥३॥)

यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता |
अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः ||१७- ४||

(जो भोगे हुए भोगों में आसक्त नहीं होता है और अभुक्त पदार्थों के प्रति आकांक्षा रहित है, ऐसा मनुष्य संसार में दुर्लभ है॥४॥)

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते |
भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः ||१७- ५||

(इस संसार में भोग और मोक्ष की इच्छा वाले (अनेकों मनुष्य) देखे जाते हैं परन्तु भोग और मोक्ष की आकांक्षा से रहित कोई विरला ही महापुरुष है॥५॥)

धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा |
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि ||१७- ६||

(धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जीवन और मरण किस उदारचित्त के लिए ग्रहण और त्याग करने योग्य नहीं है? (अर्थात इनसे कौन उदासीन है।)॥६॥)

वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ |
यथा जीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथा सुखम् ||१७- ७||

(विश्व के लय होने में जिसका राग नहीं है उसकी स्थिति में जिसको द्वेष नहीं है। यथा प्राप्य जीविका द्वारा जो पुरुष सुख पूर्वक रहता है इसी कारण वह धन्य है॥७॥)

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती |
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नास्ते यथा सुखम् ||१७- ८||

(इस ज्ञान से मैं कृतार्थ हूँ। इस प्रकार जिसकी बुद्धि गलित (निष्ठ) हो गयी है, ऐसा ज्ञानी पुरुष, देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, सुख पूर्वक रहता है॥८॥)

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च |
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ||१७- ९||

(जिसके लिए संसार सागर नष्ट हो गया है, ऐसे पुरुष की दृष्टि शून्य हो जाती है, चेष्टाएँ (व्यापार) व्यर्थ हो जाती हैं, इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं, उसकी (संसार में) कोई इच्छा अथवा विरक्ति नहीं रहती है॥९॥)

न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति |
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ||१७- १०||

(न जगत है, न सोता है, न पलक को खोलता है और न पलक को बंद करता है। आश्चर्य है मुक्तचित्त (ज्ञानी) कैसी उत्कृष्ट दशा में वर्तता (रहता) है॥१०॥)

सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः |
समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ||१७- ११||

(जीवन मुक्त ज्ञानी सब जगह स्वस्थ (शांत), सब जगह निर्मल अन्तः करणवाला दिखलाई देता है और सब जगह सब वासनाओं से रहित हो कर विराजता (रहता) है॥११॥)

पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन् गृण्हन् वदन् व्रजन् |
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ||१७- १२||

(देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, जाता हुआ निश्चय ही राग-द्वेष से मुक्त (छूटा) हुआ ऐसा महापुरुष मुक्त (ज्ञानी) है॥१२॥)

न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति |
न ददाति न गृण्हाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ||१७- १३||

(न निंदा करता है, न स्तुति करता है, न हर्ष को प्राप्त होताहै, न क्रोध करता है, न देता है, न लेता है। ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है॥१३॥)

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् |
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः ||१७- १४||

(प्रीति युक्त स्त्री को और समीप में स्थित मृत्यु को देख कर, व्याकुलता से रहित और शांत महापुरुष निश्चय ही मुक्त (ज्ञानी) है॥१४॥)

सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च |
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ||१७- १५||

(सुख में, दुःख में, नर (पुरुष) में, नारी (स्त्री) में, संपत्तियों में, विपत्तियों में ज्ञानी बिशेष रूप से सर्वत्र समदर्शी (भेद रहित) है॥१५॥)

न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता |
नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ||१७- १६||

(जिस मनुष्य के लिए न हिंसा है, न दयालुता है, न उदंडता है, न दीनता है, न आश्चर्य है और न क्षोभ है, उसी का संसार क्षीण हुआ है। (वही जीवन मुक्त है)॥१६॥)

न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः |
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ||१७- १७||

(जो न बिषयों में द्वेष करने वाला और न (ही) बिषयों में लोभ करनेवाला है तथा जो सदा आसक्ति रहित मन से प्राप्त और अप्राप्त वस्तुओं का भोग करता है, वही जीवनमुक्त है॥१७॥)

समाधानसमाधानहिताहितविकल्पनाः |
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ||१७- १८||

(जो समाधान और असमाधान, हित और अहित की कल्पना को नहीं जनता है ऐसा शून्य चित्तवाला (ज्ञानी) कैवल्य को प्राप्त हुआ (मोक्ष रूप से) स्थित है वही जीवनमुक्त है॥१८॥)

निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः |
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न ||१७- १९||

(जो ममता और अहंकार रहित है, जिसकी आशाएं उसके अभ्यंतर में गल (विलीन हो) गयी हैं, जो कुछ भी (मेरा) नहीं है ऐसा निश्चय करके कर्म करता है वह (कर्मों में कभी) लिप्त नहीं होता है॥१९॥)

मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः |
दशां कामपि संप्राप्तो भवेद् गलितमानसः ||१७- २०||

(जिसका मन गल (नष्ट हो) गया है, वह मन के प्रकाश से, चित्त की शांति से, स्वप्न और सुषुप्ति से भी ऊपर उठकर अनिर्वचनीय (आत्मानंद) की दशा को प्राप्त होता है।(वही जीवन मुक्त है)॥२०॥)